कर दो कण मुझे 22:52 (1 minute ago) छा जाओ तुम कि जैसे छा जाता है बादल आसमान में तन जाओ तुम कि जैसे तन जाता है आसमान धरती पर समो लो तुम कि जैसे समो लेता है सागर नदिया को कर दो कण मुझे कि जैसे हो जाती है चट्टान दुखों से घिस कर
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सोलो ट्रिप और ये लड़कियां भारत में पर्यटन कहाँ अकेले होता है, गर हुआ भी तो मेले मगरे, तीर्थ-मंदिर , धर्म के नाम पैदल चलकर जयकारे लगाते हुए चाची बुआ ताई मामी भाभी भैया जिज्जी या मोहल्ले भर के लोग - लुगाइयों के संग झुण्ड में यात्रा करते हुए आनंदित हुआ जाता है | अधिकाँश लोगों को तो मालूम भी नहीं कि इसे ही पर्यटन कहा जाता है | पर मैं इसे खालिस पर्यटन ही मानती हूँ | मोहल्ल्ले की तमाम औरतें जब अपनी अंटी से पइसा निकालते हुए मेले में खरीददारी करती हैं तो उनका रोमांच देखने लायक होता है | दूसरे दौर में सरकारी कर्मियों के घुमक्कड़ी अलाउंस के चलते एकल परिवार के साथ पर्यटन उभरा जिसमें माँ-पापा और दो बच्चों का साथ रहे | ज्यादा हुआ तो एक दोस्त का परिवार भी साथ ले लिया | पर संयुक्त परिवार के मुखिया और घर भर की औरतों ने मुँह पर हाथ रख कर खूब कोसा इस परम्परा को “ हा | देखो बेसर्मों को अकेले मुंह उठाया और चल दिए ..घूमने की आग लगी है ...” इस द...
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ज़िंदगी ज़िंदगी आती ही नहीं ढर्रे पर कुलाचें भरती हिरणी-सी थमती नहीं धरती पर नदियां आती ही नहीं किनारे पर मारती उछालें झरने-सी मिलती ही नहीं सागर पर बादल उतरते ही नहीं पहाड़ों पर तैरते रहते हैं हवा में बरसते ही नहीं धरती पर तारे टूटते ही नहीं धरती पर चमकते रहते हैं आसमान में कि कोई मांग ना ले इच्छा मन भर
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आत्मीय सम्बन्धों का खात्मा है मीटू माँ के ज़माने की बातें हैं और हमारे ज़माने में वो संवादों से तो कभी इशारों से बता या करती थी कि मर्द और औरत का रिश्ता रुई और आग का रिश्ता होता है | मैं हमेशा ही माँ से उलझ जाया करती थी | भला ये भी कोई रिश्ता है | मैं अम्मा से बहस कर लेती – “ बाबा से रिश्ता होता है भाई का भी रिश्ता होता है, बेटे का भी,जवाई का भी और दोस्त का भी रिश्ता होता है जो मर्द हैं ” भले ही हमारी भारतीय संस्कृति में पर-पुरुष के लिए मित्र का स्थान नहीं रहा पर अब हर किसी पराए मर्द को भाई कहने का ज़माना गया | यूं पर-पुरुष से रिश्तों की कोई ख़ास पहल नहीं कर पाई पर बेटियों के ज़माने तक आते आते इन रिश्तो की परिभाषा और भी बदल गई | कच्ची जवानी की उम्र से ही लड़के लड़कियों का साथ – साथ पढना, देर रात पढाई के बहाने पढना, साथ-साथ कॉ लेज टूर पर जाना मेरे अन्दर छिपा माँ का मन प्रश्नों से हलकान हुआ जाता था | मैं आखोँ ही आखों मे बे टियों से प्रश्न करती और बेटि यों ने आँखों ही आँखों में मेरे प्रश्नों की प्यास बुझा दी थी | हैरानी तो तब हुई जब...
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मेरे पर्स मे इतना कचरा क्यों है ? उस दिन दवाई के दुकान पर खड़ी थी | पर्स मे से डॉक्टर का पर्चा निकालने के लिए हाथ डाला | ये क्या.... ? पर्चा तो हाथ लगा नहीं पर एक जेब मे खाए हुई दवाई के मुड़े-तुड़े चमकीले रैपर थे | दूसरे जेब मे हाथ डाला तो टॉफी के थे | तीसरे जेब मे हाथ डाला तो हाथ पोंछा हुआ मुडा-तुड़ा टिश्यू पेपर था | हद तो तब हो गई जब एक थैली मे लिपटा केले का छिलका भी मेरे पर्स मे शोभायमान था | जैसे-तैसे डॉक्टर द्वारा लिखा पर्चा तो पर्स मे मिल गया पर मुझे सोचने को मजबूर होना पड़ा कि आखिर मेरे पर्स मे इतना कचरा क्यों है ? स्वच्छता अभियान कोई आज की मुहिम नहीं | आज से 40 साल पहले भी मैंने अपने सहपाठियों के साथ मिलकर स्कूल के वार्षिकोत्सव में कव्वाली गाई थी – “ भई कूड़ा मत फेंको...आहा... कि कचरा मत फेंको....ओहो....कि फेंको तो डिब्बे के अंदर...भई मस्त कलंदर....दमादम मस्त कलंदर..... ” आज 40 साल बाद भी गीत वही है कव्वाली वही है पर डिब्बा नदारद है | डिब्बा तब भी नहीं था...डिब्बा आज भी नहीं है | कहाँ ह...
दिला देगा मोक्ष मुझे
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मैं पाताल लोक में डूब रही थी मछलियों के डर से दुबक रही थी खा जाएंगी किसी भी वक्त मगरमच्छ सी दुनिया निगल लेगी समूचा मुझे कि वो देवदूत सा ले आया घसीट कर जमीन पर फूली हैं सांसे मेरी भरा है पानी मेरे फेफड़ों में उम्मीद है बचा ही लेगा मुझको मरने से वो मैं धरती के जंगलों में भटक रही थी जानवरो के भय से दुबक रही थी झाड़ियों के पीछे खा ही जाएगी सिंह सी दुनिया किसी भी वक्त उधेड़ देगी देह मेरी कि वो देवदूत सा उड़ा लाया है आसमान में जहाँ विचर रही हूँ हवा सी मैं उम्मीद है दिला ही देगा मोक्ष मुझे ले जाएगा ब्रह्मांड के पार वो !