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तुम कण क्यों हुए

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तुम कण क्यों हुए मैं तो बर्फ थी पिघल ही गई तुम तो पत्थर थे रेत क्यों हुए मैं तो नदी थी उछल ही गई तुम तो सागर थे तूफान क्यों हुए मैं तो हवा थी गुजर ही गई तुम तो पेड़ थे उखड़ क्यों गए मैं तो गुल थी झर ही गई तुम तो जड़ थे हिल क्यों गए मैं तो तारा थी टूट ही गई तुम तो ब्रह्मांड थे कण क्यों हुए
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आत्मीय सम्बन्धों का खात्मा है मीटू माँ के ज़माने की बातें हैं और हमारे ज़माने में वो संवादों से तो कभी इशारों से बता या  करती थी कि मर्द और औरत का रिश्ता रुई और आग का रिश्ता होता है | मैं हमेशा ही माँ से उलझ जाया करती थी | भला ये भी कोई रिश्ता है | मैं अम्मा से बहस कर लेती – “ बाबा से रिश्ता होता है भाई का भी रिश्ता होता है, बेटे का भी,जवाई का भी और दोस्त का भी रिश्ता होता है जो मर्द हैं ” भले ही हमारी भारतीय संस्कृति में पर-पुरुष के लिए मित्र का स्थान नहीं रहा पर अब हर किसी पराए मर्द को भाई कहने का ज़माना गया | यूं पर-पुरुष से रिश्तों की कोई ख़ास पहल नहीं कर पाई पर बेटियों के ज़माने तक आते आते इन रिश्तो की परिभाषा और भी बदल गई | कच्ची जवानी की  उम्र से ही लड़के  लड़कियों  का साथ – साथ पढना, देर रात पढाई के बहाने पढना, साथ-साथ कॉ लेज टूर पर जाना मेरे अन्दर छिपा माँ का मन प्रश्नों से हलकान हुआ जाता था | मैं आखोँ ही आखों मे बे टियों   से प्रश्न करती और बेटि यों  ने आँखों ही आँखों   में    मेरे प्रश्नों की प्यास बुझा दी थी | हैरानी तो तब हुई जब...
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मेरे पर्स मे इतना कचरा क्यों है ? उस दिन दवाई के दुकान पर  खड़ी थी |  पर्स मे से डॉक्टर का पर्चा निकालने के लिए हाथ डाला |  ये क्या.... ?  पर्चा तो हाथ लगा नहीं पर एक जेब मे खाए हुई दवाई के मुड़े-तुड़े चमकीले रैपर थे |  दूसरे जेब मे हाथ डाला तो टॉफी के थे |  तीसरे जेब मे हाथ डाला तो हाथ पोंछा हुआ मुडा-तुड़ा टिश्यू पेपर था |  हद तो तब हो गई जब एक थैली मे लिपटा केले का छिलका भी मेरे पर्स मे शोभायमान था |   जैसे-तैसे डॉक्टर द्वारा लिखा पर्चा तो पर्स मे मिल गया पर मुझे सोचने को मजबूर होना पड़ा कि  आखिर मेरे पर्स मे इतना कचरा क्यों है ?  स्वच्छता अभियान कोई आज की मुहिम नहीं |  आज से 40 साल पहले भी मैंने अपने सहपाठियों के साथ मिलकर स्कूल के वार्षिकोत्सव में कव्वाली गाई थी – “ भई कूड़ा मत फेंको...आहा... कि कचरा मत फेंको....ओहो....कि फेंको तो डिब्बे के अंदर...भई मस्त कलंदर....दमादम मस्त कलंदर..... ”  आज 40 साल बाद भी गीत वही है कव्वाली वही है पर डिब्बा नदारद है |  डिब्बा तब भी नहीं था...डिब्बा आज भी नहीं है |  कहाँ ह...

दिला देगा मोक्ष मुझे

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मैं पाताल लोक में डूब रही थी मछलियों के डर से दुबक रही थी खा जाएंगी  किसी भी वक्त मगरमच्छ सी दुनिया निगल लेगी समूचा मुझे कि वो देवदूत सा  ले आया घसीट कर जमीन पर  फूली हैं सांसे मेरी भरा है पानी  मेरे फेफड़ों में उम्मीद है बचा ही लेगा मुझको मरने से वो   मैं धरती के जंगलों में  भटक रही थी जानवरो के भय से दुबक रही थी झाड़ियों के पीछे खा ही जाएगी सिंह सी दुनिया किसी भी वक्त उधेड़ देगी देह मेरी कि वो देवदूत सा  उड़ा लाया है आसमान में जहाँ विचर रही हूँ हवा सी मैं उम्मीद है दिला ही  देगा  मोक्ष मुझे ले जाएगा  ब्रह्मांड के पार वो !

मत करो विलाप

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मत करो विलाप ए स्त्रियों ! कि विलापने से कांपती है धरती दरकता है आसमान   भी कि सुख और दुख दो पाले हैं ज़िन्दगी के खेलने दो ना उन्हें ही कबड्डी आने दो दुखों को सुख के पाले टांग छुड़ा कर भाग ही जाएंगे अपने पाले या दबोच लिये जाएंगे सुखों की भीड़ में मत करो विलाप ए स्त्रियों ! कि गरजने दो बादलों को ही बरसने दो भिगोने दो धरती को कि जीवन और मृत्यु के बीच एक महीन रेखा ही तो है मिटकर मोक्ष ही तो पाना है फिर से जीवन में आना है कि विलापने से पसरती है नकारात्मक उर्जा कि उसी विलाप को बना लो बाँध और झोंक दो जीवन में मत करो विलाप ए स्त्रियों ! कि विलापने से नहीं बदलेगी जून तुम्हारी कि मोड़ दो  धाराओं को अपने ही पक्ष में बिखेर दो रंग अपने ही जीवन में अपने आस-पास उगा दो फूल चुग लो कंकर कि तुम्हारी कईं पीढियों को एक भी कंकर ना चुभ पाये और फूलों के रास्ते रंग भरी ...
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ओ प्रेम ! जन्मा ही कहाँ है अभी तू मेरे कोख से कि कैसे कहूँ तुझे जन्मदिन मुबारक दुबका पड़ा है अब भी मेरी कोख में सहमा-सहमा सा कि कैसे चूमूँ माथा तेरा चूस रहा है अब भी आँवल से कतरा कतरा लहू मेरा कि कैसे पोषूँ धवल से नहीं जन्मना है तुझे इस कलयुगी दुनिया में ले चले मुझे कोई ब्रह्माण्ड के उस पार !
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आने दो   बेटियों   को धरती पर आने दो   बेटियों   को धरती पर मत   बजाना   थाली चाहे वरना कौन बजाएगा थालियाँ कांसे की अपने भाई भतीजो के जन्म पर आने दो बेटियों को धरती पर मत गाना मंगल गीत चाहे वरना कौन गाएगा गीत अपने वीरों की शादी में आने दो बेटियों को धरती पर मत   देना कोई विश्वास उन्हें वरना   कैसे होंगे दर्ज अदालत में घरेलू हिंसा के मामले आने दो बेटियों   धरती पर मत देना कोई आशीर्वाद उन्हें वरना कौन देगा गालियाँ माँ-बहन के नाम पर           आने दो बेटियों को धरती पर मत देना दान-दहेज़ उन्हें वरना कैसे जलाई जाएँगी बेटियाँ पराए लोगों के बीच आने दो बेटियों को धरती पर पनपने दो भ्रूण उनके वरना कौन धारण करेगा तुम्हारे बेटों के भ्रूण                                    ...