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सृष्टि बोस्टन और मफलर

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जब मुझे खबर मिली कि मेरी बेटी सृष्टि बोस्टन से चलकर अम्बिकापुर से केवल दो दिन के लिये आने वाली है तो मुझे समझ मे नही आ रहा था कि उसके लिये क्या गिफ्ट जुटाऊँ । फिर मुझे आइडिया सूझा कि हाथ से  एक मफलर बुन कर दे दूँ । उधेड़ बुन में दिन निकलते जा रहे थे । अनत: ऊन खरीदी गई ऑफ वाइट रंग की  और दूसरा रंग ग्रे लिया गया । पर दिन कम थे सो मैंने क्रोशिये से बुनने का फैसला किया । उसे कुछ अलग रूप देने के लिये किनारे सलाइयों से बुने और उस पर नाम उकेर दिया सृष्टि । दूसरे तरफ बॉस्टन तीसरी और चौथी तरफ एम.आई टी. | एक हफ्ता उसके आने में शेष था और मेरी उंगलियाँ तेजी से चल रही थी । आखिर बन ही गया मफलर । सबसे खुशी की बात यह थी कि उसे पसन्द आया । बॉस्टन जाकर उसने मु झे अपने  जन्मदिन पर कहा –“ माँ ! आज आपका बुना मफलर पहन कर जा रही हूँ ” मुझे लगा मेरा बुनना सार्थक हो गया |
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यात्रा-संस्मरण साइकिलों का शहर है बर्लिन जर्मन जाने के प्रति जितना उत्साह और उत्सुकता थी उसने मुझे जर्मन यात्रा के दौरान दुगुना बन कर मुझे रोमांच से भरपूर सराबोर कर दिया था। पहली विदेश यात्रा …. वो भी यूरोप की ….. उस पर बेटी सृष्टि के सेमिनार में बुलावा वैसे भी किसी रोमांच से कम नहीं था उस पर दिल्ली   एयरपोर्ट से एम्सटर्डम एयरपोर्ट तक की हवाई यात्रा.... एम्सटर्डम एयरपोर्ट पर लम्बी कदमताल करके बर्लिन के लिए छोटे एयरक्राफ्ट से प्रस्थान ने हमारे रोमांच में इज़ाफा ही किया था । पर ये रोमांच कदम दर कदम बढता ही जाएगा इसका मुझे अन्दाज़ ही नहीं था । बर्लिन एयरपोर्ट पर पहुँचते ही हमने चारों दिशाओं में नज़र घुमाई तो मैं और सृष्टि एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए । अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए हमने बस ली । सब कुछ नया-नया लग रहा था । एक मोड़ पर एक युवती साइकिल पर दिखी । मेरी आँखें आश्चर्य से फैल गई । विदेशी चकाचौंध में साइकिल का क्या काम ? मैं खुद से ही बात कर रही थी । पर ज्यों-ज्यों हमारी बस शहर की दूरियाँ नापती जा रही थी साईकिल के नज़ारों में इज़ाफा होता जा र...

tum tab aaye

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तुम तब आए !                                                                                                              ज़िन्दगी की राह पर                                                        बुहारते हुए कांटे                ...

मैं डरती नहीं हूँ

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मैं डरती  नहीं हूँ  श्वानों से मालूम है भौकेंगे काटेंगे और मैं हट जाउंगी पीछे मैं डरती  नहीं हूँ सर्पों से मालूम हैं फूफकारेंगे डसेंगे और मैं बदल लूंगी रास्ते अपने मैं डरती  नहीं हूँ  हैवानों से मालूम है झपटेंगे  करेंगे वार और मैं भी खींच लूंगी अस्त्र  अपने मैं तो डरती  हूँ बस इंसानो से मालूम ही नहीं भौकेंगे या काटेंगे फूफकारेंगे या  डसेंगे झपटेंगे या करेंगे  वार   और मैं नहीं हट पाऊँगी पीछे नहीं बदल पाउंगी रास्ते अपने नहीं करा पाउंगी पलटवार अस्त्र से हाँ मैं डरती हूँ इंसानों से ।
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मैं  नही जानती थी कि प्रेम क्या होता है बस हर समय एक शिशु में चाह्त में डूबती उतराती रहती थी ये जानते हुए भी कि शिशु का आना तो ईशवर का आना होता है धरती पर और ईशवर कब आते है मुझ पापिनी के लिए धरती पर   हाँ ! वो समय था जब मैने चाहा था ईश्वर से एक अबोध शिशु सा चेहरा एक चमत्कार की क्षीण सी रेखा मेरी आँखों में कौंधी थी मैं भागी थी उस रेखा के पीछे भागने और हाँफने की बीच हुए हाद्सों में तुम बीच रास्तों में गिरे मेरे मांस के लोथड़े उठाते चलते रहे मैने पीछे मुड़ कर देखा तुम्हारे हाथ भी लहू से लाल हो गए थे   चमत्कार की वो क्षीण रेखा गहराती गई ईश्वर को आना ही पड़ा मुझ पापिनी के पेट से तुम जो थे ईश्वर के दूत-से मेरे इर्द – गिर्द   मुझे तुम्हारे चेहरे में वो शिशु नज़र आया था कितने कर्ज़ हो गए हैं मुझ पर तुम्हारे एक-एक कर उतार दूँगी वो सब कर्ज़ पर माँ होने का कर्ज़ कैसे चुका पाऊँगी ता-उम्र रहूँगी कर्ज़दार तुम्हारी
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तू जब भी आता है मुझे याद आता है मै कर्ज़दार हूँ तेरी हर बार तेरे आने पर उठती हूँ नींद से सजती हूँ संवरती हूँ सोचती हूँ आज तेरा कर्ज़ उतार ही आऊँ सज संवर कर गुनगुनाती खुद को तैयार करती हूँ तेरे कोड़े खाने के लिए ना जाने कितने चाबुक से उतरेगा कर्ज़ तेरा काँपते हुए हाथ लरज़ते हुए होंठ चिपकी हुई ज़ुबान सहमा हुआ दिल बन्द आँखें नम - सी फूल - से स्पर्श से  खुल जाती हैं मेरे काँपते हाथ प्रार्थना के लिए जुड़ जाते हैं उंगली के पोरों का स्पर्श मेरे लरज़ते होठों पर ठण्डक दे जाता है तेरी खामोशपन चिपकी हुई जबान को मत्रोच्चारण दे जाता है सहमा हुआ दिल  तेरे कदमों में झुक जाता है बन्द आँखे खुलती हैं गर्म धारा के साथ सामने धवल वस्त्रों में तू दूत नज़र आता है सुना है तेरी देहरी पर कर्ज़ माफ होते हैं
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मै नींव तेरे मकान की कभी खुदी कभी चिनी हिली नहीं वहीं रही बनी रही बनी रही मै नींव तेरे मकान की मैं चाह कभी बनी नहीं मकान के कंगूरे की सजाती रही औरों को अन्धेरे में मैं खुद रही मै नींव तेरे मकान की उन पत्तियों-सी पेड़ की धूप रोक छांह बनी झुलसीजब समय चक्र में पीली बन मैं झड़ चली  मै नींव तेरे मकान की उस नदी-सी कल-कल बही प्रेम प्यार लुटा चली सोख दुनिया ने जब ली पैरों तले मैं रौन्दी गई मै नींव तेरे मकान की तेरे पैरों को ज़मीन दी तेरे पंखों को उड़ान दी जब तुझे लगा कि व्यर्थ हूँ मोक्ष आत्मा-सी हुई मै नींव तेरे मकान की