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धरती के दरबार में हमने क्या क्या देखा मुड़-मुड के इस ज़िंदगी को हमने फिर से देखा ज़हर से भी कड़वी है , क्या कहना ये दुनिया तन मेरा पड़ गया नीला सारा ,जैसे गरम सलाईयां कोई तो आया शिवजी  बन के, अपने गल पर रखा धरती के दरबार में,हमने क्या क्या देखा मुड़-मुड के इस ज़िंदगी को हमने फिर से देखा ये दुनिया तलवार दोधारी, जख्म करे जी भर के इधर चलूँ तो लहू रिसे,उधर चलूँ तो कत्ल दिलों के कोई तो आया ईश्वर बन के, इन ज़खमों पर मरहम रखा धरती के दरबार में ,हमने क्या क्या देखा मुड़-मुड के इस ज़िंदगी को हमने फिर से देखा ये दुनिया है आग का शोला, मैं भी बन गयी अंगारा ठंड पिलाते जली हथेली ,रूह मेरी शोले भरी पिटारा कोई तो आया रब्ब बन के, मारी फूंके छींटा रखा धरती के दरबार में,हमने क्या क्या देखा मुड़-मुड के इस ज़िंदगी को हमने फिर से देखा

मैं मेंहंदी

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मैं इक निकी जी पत्ती  खोरे केडे बूते दी  उड़ के पई सी  धरती ते  सुक के तीला  हो जाणा सी  ख़ाक हो जाणा सी  मिट्टी नाल  रब्ब ने आके चुकया  पीसया वटयाँ  नाल  दर्द दी हूक उठी भावें  पर गीली होके  खिली सी  मैं  रब्ब ने ही खोरे हत्थां ते  रख दित्ता  फुल  ते बूट्यां नाल  लाल निकल आई  हाँ ! मैं मैहन्दी जे सी  खोरे उसे बूटे दी 

की होंदी ए आज़ादी

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रब्ब जी ! दसो ना सानू की होंदी ए आज़ादी कि  चिड़िया नू दे दो पंख या कि  पंखा नू दे दो आसमान रब्ब जी! दसो ना सानू की होंदी ए आज़ादी कि वगा दो दरिया ज़मी ते या कि  दरिया नू दे दो समंदर रब्ब जी ! दसो ना सानू की होंदी ए आज़ादी कि दिल विच पा दयो रूह या कि तन चौ कर दो मुक्त रूह

एक पंजाबी कविता

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इक दिल सी टूट्या भजया लहू विच भिजया सुइयां नाल भेदया धाग्या नाल छिलया रब्ब  ने आके हत्था नाल चुक्या मारियाँ फूँका हौले-हौले अथ्रुआ नाल सी दीतिया सारियाँ सीणा चुक के ला लिता  अपणे दिल नाल पंजाबी कविता 

वो सतरंगी स्वेटर

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2006 में हम लद्दाख गए तो यह सोचा नहीं था कि वो मेरी निटिंग का ऐतिहासिक ट्रिप बन जाएगा | मैं हमेशा की तरह अपनी उन सलाई तो लेकर ही गयी थी | वहाँ एक दिन बाज़ार में इन्द्रधनुषी स्वेटर देखा कर मन मचल गया | पास जाकर देखा तो हाथ का बना हुआ था | मैंने उन की दूकान की खोज की | वोव ! वहातो वही सात रंग के उन थी | मैंने झट से इ ली | और घर पहुंचाते ही सबसे पहले आस्था का स्वेटर बनाया जो सबको बेहद पसंद आया | अब मुझे इश्वर की कृपा का नहीं मालूम था कि २००८ में स्पंदन आया | और फिर क्या था मैंने उस बची हुई लद्दाखी ऊन का स्वेटर बनाया | हुड वाला यह स्वेटर मेरे लिए अमूल्य था | जो बाद में बिंदिया पत्रिका में प्रकाशित हुआ |

पूसी कैट

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खिलौना बनानेका यह पहला अनुभव तो नहीं था | बरसो पहले यानी करीबी २५ साल पहले एक टेडी बार बनाया था | पर उसकी फोटो नहीं है मेरे पास | इस बार पूसी कैट बना कर फिर से शुरुआत की | गोल सलाई पर जुराब की तरह बुनते हुए नीचे से शुरू किया | गर्दन पर फंदे घटाए ,चहरे पर कुछ फंदे घटाए और कानों के लिए दो हिस्सों में बाँट दिया | पूंछ को अलग से बुनकर जोड़ा | मूंछे और आँखे कढाई करके उकेरी | लो रूई भर कर तैयार हमारी पूसी कैट |

कश्मीरी कली

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अपने बेटी आस्था का मैं ऐसा स्वेटर बनाना चाहती थी जो कशमीर के फिरन का लुक दे | उसके किनारों पर और गले पर स्लीव्ज़ पर भी कुछ छोटा-छोटा डिजाइन हो | आस्था छोटी थी इस लिए मैंने लाल रंग चुना और उसे ऑफ़ व्हाईट कलर से छोटी कैरी बनाई | लम्बे कुरते में साइड जेब के लिए भी जगह छोडी |गले के बीच पत्ती के साइड में कैरी भी बनाई और बटन भी लगाए फिर उसके नीचे पाजामे भी बुनी | इसका काफ़ी हिस्सा मुम्बई की ट्रेन में और चौपाटी बीच पर बुना गया जब मैं राजभाषा की बैठक में मुम्बई गई थी | आस्था ने जब इसे पहना तो वो जेब में हाथ डालकर इठला गई | छोटी सी गुडिया कश्मीरी कली से कम नहीं लगा रही थी |