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तू जड़ मैं चेतन

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मैं तेरे नेह में इस कदर भीग गई हूँ कि ज्यों रुई कि बाती वसा में भीगती है और दिप-दिप जलती है तम से लड़ती है तेरा निरंतर नेह मेरी आत्मा को भिगो रहा है निरंतर और मेरी देह का सिरा मेरा मस्तिष्क दिप-दिप जल रहा है संघर्ष रत है तम से वलय प्रकाश का चारों ओर ओ ! मेरे नेह के स्त्रोत जिस क्षण रुकेगी तेरी नेह धारा देख मेरी आत्मा भी सूख जायेगी और मस्तिष्क प्रदीप्त नही होगा उसी क्षण सोच ! क्या हश्र होगा मेरा मैं तो जड़ हूँ और तू चेतन देखना मैं ओर भी जड़ हो जाऊंगी (दीपावली की रात )
ब्लॉग की दुनिया के दोस्तों को मेरा अभिवादन ! आज ब्लॉग की दुनिया में पहला कदम रखते हुए मुझे प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है! मैं कस्बाई संस्कृति में रहने वाली कभी सोच भी नही सकती थी की मैं भी कभी ब्लॉग लिखूंगी कवियायें लिखना मेरा प्रिया शगल है और निश्चय ही मैं आप तक अपने विचार कविता के माध्यम से पहुन्चाॐगी खोज बीन के अपने आप से ही सीखते हुए यहाँ तक पहुँची हूँ बाय संगीता सेठी