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Showing posts from August, 2015

सृष्टि बोस्टन और मफलर

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जब मुझे खबर मिली कि मेरी बेटी सृष्टि बोस्टन से चलकर अम्बिकापुर से केवल दो दिन के लिये आने वाली है तो मुझे समझ मे नही आ रहा था कि उसके लिये क्या गिफ्ट जुटाऊँ । फिर मुझे आइडिया सूझा कि हाथ से  एक मफलर बुन कर दे दूँ । उधेड़ बुन में दिन निकलते जा रहे थे । अनत: ऊन खरीदी गई ऑफ वाइट रंग की  और दूसरा रंग ग्रे लिया गया । पर दिन कम थे सो मैंने क्रोशिये से बुनने का फैसला किया । उसे कुछ अलग रूप देने के लिये किनारे सलाइयों से बुने और उस पर नाम उकेर दिया सृष्टि । दूसरे तरफ बॉस्टन तीसरी और चौथी तरफ एम.आई टी. | एक हफ्ता उसके आने में शेष था और मेरी उंगलियाँ तेजी से चल रही थी । आखिर बन ही गया मफलर । सबसे खुशी की बात यह थी कि उसे पसन्द आया । बॉस्टन जाकर उसने मु झे अपने  जन्मदिन पर कहा –“ माँ ! आज आपका बुना मफलर पहन कर जा रही हूँ ” मुझे लगा मेरा बुनना सार्थक हो गया |
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यात्रा-संस्मरण साइकिलों का शहर है बर्लिन जर्मन जाने के प्रति जितना उत्साह और उत्सुकता थी उसने मुझे जर्मन यात्रा के दौरान दुगुना बन कर मुझे रोमांच से भरपूर सराबोर कर दिया था। पहली विदेश यात्रा …. वो भी यूरोप की ….. उस पर बेटी सृष्टि के सेमिनार में बुलावा वैसे भी किसी रोमांच से कम नहीं था उस पर दिल्ली   एयरपोर्ट से एम्सटर्डम एयरपोर्ट तक की हवाई यात्रा.... एम्सटर्डम एयरपोर्ट पर लम्बी कदमताल करके बर्लिन के लिए छोटे एयरक्राफ्ट से प्रस्थान ने हमारे रोमांच में इज़ाफा ही किया था । पर ये रोमांच कदम दर कदम बढता ही जाएगा इसका मुझे अन्दाज़ ही नहीं था । बर्लिन एयरपोर्ट पर पहुँचते ही हमने चारों दिशाओं में नज़र घुमाई तो मैं और सृष्टि एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए । अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए हमने बस ली । सब कुछ नया-नया लग रहा था । एक मोड़ पर एक युवती साइकिल पर दिखी । मेरी आँखें आश्चर्य से फैल गई । विदेशी चकाचौंध में साइकिल का क्या काम ? मैं खुद से ही बात कर रही थी । पर ज्यों-ज्यों हमारी बस शहर की दूरियाँ नापती जा रही थी साईकिल के नज़ारों में इज़ाफा होता जा र...

tum tab aaye

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तुम तब आए !                                                                                                              ज़िन्दगी की राह पर                                                        बुहारते हुए कांटे                ...

मैं डरती नहीं हूँ

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मैं डरती  नहीं हूँ  श्वानों से मालूम है भौकेंगे काटेंगे और मैं हट जाउंगी पीछे मैं डरती  नहीं हूँ सर्पों से मालूम हैं फूफकारेंगे डसेंगे और मैं बदल लूंगी रास्ते अपने मैं डरती  नहीं हूँ  हैवानों से मालूम है झपटेंगे  करेंगे वार और मैं भी खींच लूंगी अस्त्र  अपने मैं तो डरती  हूँ बस इंसानो से मालूम ही नहीं भौकेंगे या काटेंगे फूफकारेंगे या  डसेंगे झपटेंगे या करेंगे  वार   और मैं नहीं हट पाऊँगी पीछे नहीं बदल पाउंगी रास्ते अपने नहीं करा पाउंगी पलटवार अस्त्र से हाँ मैं डरती हूँ इंसानों से ।