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दिला देगा मोक्ष मुझे

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मैं पाताल लोक में डूब रही थी मछलियों के डर से दुबक रही थी खा जाएंगी  किसी भी वक्त मगरमच्छ सी दुनिया निगल लेगी समूचा मुझे कि वो देवदूत सा  ले आया घसीट कर जमीन पर  फूली हैं सांसे मेरी भरा है पानी  मेरे फेफड़ों में उम्मीद है बचा ही लेगा मुझको मरने से वो 

 मैं धरती के जंगलों में  भटक रही थी जानवरो के भय से दुबक रही थी झाड़ियों के पीछे खा ही जाएगी सिंह सी दुनिया किसी भी वक्त उधेड़ देगी देह मेरी कि वो देवदूत सा  उड़ा लाया है आसमान में जहाँ विचर रही हूँ हवा सी मैं उम्मीद है दिला ही  देगा  मोक्ष मुझे ले जाएगा  ब्रह्मांड के पार वो !

नाद

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ये जो नाद
बाहर है
भीतर क्यों नहीं
ये जो नाद
भीतर है
बाहर क्यों नहीं
क्यों ये नाद
ऊपर है
नीचे नहीं
क्यों ये नाद
नीचे है
ऊपर नहीं
क्यों ये नाद
हिलोरें मारता
वाष्प नहीं
बाहर के नाद
अंदर आओ
तुम
अंदर के नाद
बाहर आओ
तुम
उतरो नीचे
आसमां से
ओ नाद
चलो तुम
आसमां में
मुझ संग ओ नाद
एकमेक हो जाएं
हम कि
एक ही हो नाद
खूबसूरत
ब्रह्मांड की
कल्पना में
कुछ करें
समानुभूति स
इस धरती पर

मत करो विलाप

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मत करो विलाप ए स्त्रियों ! कि विलापने से कांपती है धरती दरकता है आसमानभी
कि सुख और दुख दो पाले हैं ज़िन्दगी के खेलने दो ना उन्हें ही कबड्डी आने दो दुखों को सुख के पाले टांग छुड़ा कर भाग ही जाएंगे अपने पाले या दबोच लिये जाएंगे सुखों की भीड़ में
मत करो विलाप ए स्त्रियों ! कि गरजने दो बादलों को ही बरसने दो भिगोने दो धरती को कि जीवन और मृत्यु के बीच एक महीन रेखा ही तो है मिटकर मोक्ष ही तो पाना है फिर से जीवन में आना है कि विलापने से पसरती है नकारात्मक उर्जा कि उसी विलाप को बना लो बाँध और झोंक दो जीवन में
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ओ प्रेम ! जन्मा ही कहाँ है अभी तू मेरे कोख से कि कैसे कहूँ तुझे जन्मदिन मुबारक
दुबका पड़ा है अब भी मेरी कोख में सहमा-सहमा सा कि कैसे चूमूँ माथा तेरा
चूस रहा है अब भी आँवल से कतरा कतरा लहू मेरा कि कैसे पोषूँ धवल से
नहीं जन्मना है तुझे इस कलयुगी दुनिया में ले चले मुझे कोई ब्रह्माण्ड के उस पार !
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आने दोबेटियोंको धरती पर आने दोबेटियोंको धरती पर
मतबजानाथाली चाहे
वरना कौन बजाएगा
थालियाँ कांसे की
अपने भाई भतीजो के जन्मपर

आने दो बेटियों को धरती पर
मत गाना मंगल गीत चाहे
वरना कौन गाएगागीत
अपने वीरों की शादी में

आने दो बेटियों को धरती पर
मतदेनाकोई विश्वास उन्हें
वरनाकैसे होंगे दर्ज अदालत में
घरेलू हिंसा के मामले

आने दो बेटियोंधरती पर
मत देना कोई आशीर्वाद उन्हें
वरना कौनदेगा गालियाँ
माँ-बहन के नाम पर


आने दो बेटियों को धरती पर
मतदेना दान-दहेज़ उन्हें
वरना कैसे जलाई जाएँगी बेटियाँ
पराए लोगों के बीच

आने दो बेटियों को धरती पर

सृष्टि बोस्टन और मफलर

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जब मुझे खबर मिली कि मेरी बेटी सृष्टि बोस्टन से चलकर अम्बिकापुर से केवल दो दिन के लिये आने वाली है तो मुझे समझ मे नही आ रहा था कि उसके लिये क्या गिफ्ट जुटाऊँ । फिर मुझे आइडिया सूझा कि हाथ से  एक मफलर बुन कर दे दूँ । उधेड़ बुन में दिन निकलते जा रहे थे । अनत: ऊन खरीदी गई ऑफ वाइट रंग की  और दूसरा रंग ग्रे लिया गया । पर दिन कम थे सो मैंने क्रोशिये से बुनने का फैसला किया । उसे कुछ अलग रूप देने के लिये किनारे सलाइयों से बुने और उस पर नाम उकेर दिया सृष्टि । दूसरे तरफ बॉस्टन तीसरी और चौथी तरफ एम.आई टी.| एक हफ्ता उसके आने में शेष था और मेरी उंगलियाँ तेजी से चल रही थी । आखिर बन ही गया मफलर । सबसे खुशी की बात यह थी कि उसे पसन्द आया । बॉस्टन जाकर उसने मुझे अपने  जन्मदिन पर कहा –“माँ ! आज आपका बुना मफलर पहन कर जा रही हूँ ” मुझे लगा मेरा बुनना सार्थक हो गया |



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यात्रा-संस्मरण
साइकिलों का शहर है बर्लिन

जर्मन जाने के प्रति जितना उत्साह और उत्सुकता थी उसने मुझे जर्मन यात्रा के दौरान दुगुना बन कर मुझे रोमांच से भरपूर सराबोर कर दिया था। पहली विदेश यात्रा….वो भी यूरोप की…..उस पर बेटी सृष्टि के सेमिनार मेंबुलावा वैसे भी किसी रोमांच से कम नहीं था उस पर दिल्ली एयरपोर्ट से एम्सटर्डम एयरपोर्ट तक की हवाई यात्रा.... एम्सटर्डम एयरपोर्ट पर लम्बी कदमताल करके बर्लिन के लिए छोटे एयरक्राफ्ट से प्रस्थान ने हमारे रोमांच में इज़ाफा ही किया था । पर ये रोमांच कदम दर कदम बढता ही जाएगा इसका मुझे अन्दाज़ ही नहीं था ।
बर्लिन एयरपोर्ट पर पहुँचते ही हमने चारों दिशाओं में नज़र घुमाई तो मैं और सृष्टि एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए । अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए हमने बस ली । सब कुछ नया-नया लग रहा था । एक मोड़ पर एक युवती साइकिल पर दिखी । मेरी आँखें आश्चर्य से फैल गई । विदेशी चकाचौंध में साइकिल का क्या काम ? मैं खुद से ही बात कर रही थी । पर ज्यों-ज्यों हमारी बस शहर की दूरियाँ नापती जा रही थी साईकिल के नज़ारों में इज़ाफा होता जा रहा था |“ज़ूलॉस्चिकल गार्टन ”पर हमें मेट्रो …