
आत्मीय सम्बन्धों का खात्मा है मीटू माँ के ज़माने की बातें हैं और हमारे ज़माने में वो संवादों से तो कभी इशारों से बता या करती थी कि मर्द और औरत का रिश्ता रुई और आग का रिश्ता होता है | मैं हमेशा ही माँ से उलझ जाया करती थी | भला ये भी कोई रिश्ता है | मैं अम्मा से बहस कर लेती – “ बाबा से रिश्ता होता है भाई का भी रिश्ता होता है, बेटे का भी,जवाई का भी और दोस्त का भी रिश्ता होता है जो मर्द हैं ” भले ही हमारी भारतीय संस्कृति में पर-पुरुष के लिए मित्र का स्थान नहीं रहा पर अब हर किसी पराए मर्द को भाई कहने का ज़माना गया | यूं पर-पुरुष से रिश्तों की कोई ख़ास पहल नहीं कर पाई पर बेटियों के ज़माने तक आते आते इन रिश्तो की परिभाषा और भी बदल गई | कच्ची जवानी की उम्र से ही लड़के लड़कियों का साथ – साथ पढना, देर रात पढाई के बहाने पढना, साथ-साथ कॉ लेज टूर पर जाना मेरे अन्दर छिपा माँ का मन प्रश्नों से हलकान हुआ जाता था | मैं आखोँ ही आखों मे बे टियों से प्रश्न करती और बेटि यों ने आँखों ही आँखों में मेरे प्रश्नों की प्यास बुझा दी थी | हैरानी तो तब हुई जब...