Friday, December 11, 2015


ओ प्रेम !
जन्मा ही कहाँ है
अभी तू मेरे कोख से
कि कैसे कहूँ
तुझे जन्मदिन मुबारक

दुबका पड़ा है
अब भी मेरी कोख में
सहमा-सहमा सा
कि कैसे चूमूँ
माथा तेरा

चूस रहा है
अब भी आँवल से
कतरा कतरा
लहू मेरा
कि कैसे पोषूँ
धवल से

नहीं जन्मना है
तुझे इस
कलयुगी दुनिया में
ले चले मुझे कोई
ब्रह्माण्ड के उस पार !

1 comment:

  1. बहुत ही सुंदर एवं खूबसूरत।

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