Tuesday, May 28, 2013



तू जब भी आता है
मुझे याद आता है
मै कर्ज़दार हूँ तेरी

हर बार तेरे आने पर
उठती हूँ नींद से
सजती हूँ संवरती हूँ
सोचती हूँ आज
तेरा कर्ज़ उतार ही आऊँ

सज संवर कर गुनगुनाती
खुद को तैयार करती हूँ
तेरे कोड़े खाने के लिए
ना जाने कितने चाबुक से
उतरेगा कर्ज़ तेरा

काँपते हुए हाथ
लरज़ते हुए होंठ

चिपकी हुई ज़ुबान
सहमा हुआ दिल
बन्द आँखें नम-सी
फूल-से स्पर्श से 
खुल जाती हैं

मेरे काँपते हाथ
प्रार्थना के लिए
जुड़ जाते हैं
उंगली के पोरों का स्पर्श
मेरे लरज़ते होठों पर
ठण्डक दे जाता है
तेरी खामोशपन
चिपकी हुई जबान को
मत्रोच्चारण दे जाता है

सहमा हुआ दिल

 तेरे कदमों में
झुक जाता है
बन्द आँखे खुलती हैं
गर्म धारा के साथ
सामने धवल वस्त्रों में
तू दूत नज़र आता है
सुना है तेरी देहरी पर
कर्ज़ माफ होते हैं

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