क्या छतें साफ नहीं हो सकती

इतने खूबसूरत शहर की सड़के दोनों तरफ ताज़ा पुती दीवारें चौराहों और नुक्कड़ों पर खूबसूरत हवेलियाँ लक-दक शीशों के पार दिखती मॉल की चमक जिसके चारों तरफ मंडराते आधुनिक पोशाकों में संवरे लोग महज 10 रुपये में ए.सी. बसों का सफर करीने से सजी दुकानें फ्लैटों की बालकनी में बच्चों के बाल संवारती माँए उन्हीं फ्लैटों में अपने खूबसूरत आस-पास के अहसास में सराबोर एक दिन चढ गई सीढीयाँ उस छत की जहाँ से पूर शहर का नज़ारा दिख रहा था मुझे पर वो हवेलियाँ, वो मॉल ,वो बसें सिर्फ बिन्दु-सी दिखाई दे रही थी दिख रहा था तो बस छतों पर पड़ा बेतरतीब कचरा कभी ना काम आने वाली टूटी हुई कुर्सियाँ गुलदान पुताई के पंछे पुरानी तस्वीरों के बोर्ड टूटी ईंटें घड़े के ठीकरे जंग लगे मटके के स्टैण्ड, टूटी बाल्टी और भी ना जाने क्या-क्या तमाम छतों पर पड़े सामान का नज़ारा लग रहा था भयानक मै घबरा कर उतर आई सीढीयाँ दम फूलने लगा हाँफ रही थे मैं कहाँ गई शहर की खूबसूरती मैं जो चिल्लाती हूँ बच्चों पर वो सही है कि बैठक साफ करने से नहीं आती है सफाई दरअसल हम सफाई की शुरुआत बैठक से करते हैं और तमाम कचरा गलियारे बेडरूम किचन गैरज और फिर छत की तरफ बुहार द...